प्रत्येक परिस्थिति- साधन सामग्री- कल हमने देखा कि
सुख-दुःखकी एक परिभाषा यह हुई कि सुख नाम हुवा बाहरकी अनुकूल सामग्री का और दुःख नाम हुवा बाहरकी सामग्रीके अभाव का.
दूसरी वास्तविक परिभाषा सुख-दुःखकी यह है कि जिसके मन मे हर समय प्रसन्नता ‘रहती है-वही सुखी है.
चाहे उसके पास बाहरी सामग्री कम है अथवा नही है या बहुत अधिक है, पर जिसके मनमे चिंता-फिकर नही है, वही सुखी है.
बाहरकी सामग्री अत्यधिक मात्रा मे रहते हुवे भी हृदय जलता है, मनमे दुःख-संताप है, तो वह दुःखी ही है
अब मन मे प्रश्न उठता है कि किसी के यहाँ चोरी हुवी, किसी को किसीने चोट पहुंचाई, नुकसान किया,या अपमानित किया, तो दूसरा व्यक्ति दुःख देनेवाला हुवा न? फिर यह कैसे कहा गया कि दुःख देनेवाला कोई दूसरा नहीं है?
इसका उत्तर यह है कि दूसरे व्यक्ति दुःखदायी परिस्थिति तो पैदा करते है, किन्तु उस परिस्थितिमे दुःखी होना अथवा न होना, यह अपने हाथ की बात है। कोई भी हमे दुःखी होनेके लिए बाध्य नहीं कर सकता। दुःखकी परिस्थिति देनेमे जो दूसरे निमित्त बनते है, वह हमारे प्रारब्ध का फल है; परन्तु हर परिस्थितिमे हम प्रसन्न रह सकते है।
सुख की सामग्री और दुःख की सामग्री दोनों ही भगवतप्राप्तिकी साधन सामग्री है। फ़रक इतना है कि दुःखदायी परिस्थिति जल्दी कल्याण करनेवाली है। क्योंकि दुःखदायी परिस्थितिमे भगवान याद आते है.
दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे को होय ॥- संत कबीर
स्वामी रामसुखदासजी महाराजके ‘कल्याणकारी प्रवचनों से

सुन्दर, अति सुन्दर। सुख दुःख की परिभाषा सहज से बतलाई है।
ये स्वामी रामसुखदासजी के वचन हैं। मेरे जीवन पर उनका बहुत प्रभाव रहा है